History of Bhagat Singh

सीने पर गोली खाना चाहते थे भगत सिंह |

Bhagat wanted to shoot Singh’s chest.

स्वतंत्र भारत के सपने के लिए भगत सिंह ने लाहौर जेल में हर दिन बिताया …

Bhagat Singh spent every hard day in Lahore jail for the dream of independent India…

शहीद-ए-आजम भगत सिंह सैनिकों जैसी शहादत चाहते थे। वह फांसी की बजाए सीने पर गोली खाकर वीरगति को प्राप्त होना चाहते थे। यह बात भगत सिंह द्वारा लिखे गए एक पत्र से मालूम हुई है। भगत सिंह के प्रपौत्र यादवेंद्र सिंह संधू ने आईबीएन खबर को बताया कि 20 मार्च 1931 को भगत सिंह ने पंजाब के तत्कालीन गवर्नर से मांग की थी कि उन्हें युद्धबंदी माना जाए और फांसी पर लटकाने की बजाए गोली से उड़ा दिया जाए। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने उनकी यह बात नहीं मानी। भगत सिंह की एक अमानत फरीदाबाद में रहने वाले उनके प्रपौत्र यादवेंद्र सिंह संधू के पास सुरक्षित है। हम बात कर रहे हैं उनकी जेल डायरी की। यह डायरी उनके पूरे व्यक्तित्व को समझने के लिए काफी है।

विचार लिखने के लिए डायरी मांगी –सिर्फ 23 साल की उम्र में शहादत को प्राप्त‍ करने वाले भगत सिंह पढ़ने-लिखने में काफी रुचि लेते थे। इसीलिए उन्होंंने लाहौर जेल में रहते हुए जेल प्रशासन से अपने विचार लिखने के लिए डायरी मांगी। जेल प्रशासन ने 12 सितंबर 1929 को उन्हें डायरी प्रदान की। जिसमें उन्होंने अपने विचार लिखे।

हर पन्ने पर झलकती है वतनपरस्ती –यह डायरी फरीदाबाद में रहने वाले उनके वंशजों के पास सुरक्षित है। हमने डायरी के कुछ पन्नेे अपने कैमरे में कैद किए। गजब की अंग्रेजी लिखावट के साथ-साथ एक बेहतर देश और समाज बनाने के उनके विचार भी इसमें छिपे हुए हैं। 404 पेज की इस डायरी के हर पन्ने पर वतनपरस्तीे झलकती है।

जेल में गुजारा हर लम्हा इसमें है कैद –आजाद भारत के सपने को लेकर भगत सिंह ने लाहौर जेल में जो कठिन दिन गुजारे उसका हर लम्हा इसमें कैद है। इसे देखने, पढ़ने पर पता चलता है कि वह अर्थशास्त्र की भी अच्छी समझ रखते थे। इसमें उन्होंने अमेरिका, इंग्लैंड की प्रति व्यक्ति आय, इंग्लैंइ की आय में भारतीय योगदान बताया है। आंकड़ों को देखकर पता चलता है कि गणित में भी उनकी अच्छी पकड़ थी।

पूंजीवाद और साम्राज्यवाद को बताया है खतरा –27 सितंबर 1907 को लाहौर में जन्मे भगत सिंह ने अपनी डायरी में पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के खतरे भी बताए हैं। डायरी के पन्ने उनकी साहित्यिक रुचि का भी बयान करते हैं। जिसमें उन्होंने स्वाच्छंदवाद के हिमायती मशहूर अमेरिकी कवि जेम्सं रसेल लावेल की आजादी के बारे में लिखी गई कविता ‘फ्रीडमʼ लिखी है। इसके अलावा शिक्षा नीति, जनसंख्याक, बाल मजदूरी और सांप्रदायिकता आदि विषयों को भी छुआ है।

जो गम की घड़ी भी खुशी से गुजार दे… –उर्दू और अंग्रेजी में लिखी गई इस डायरी के पन्ने अब पुराने हो चले हैं लेकिन इसमें दर्ज एक-एक शब्द सरफरोशी की समां जला देते हैं। इसमें एक जगह वह लिखते हैं कि दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे, जो गम की घड़ी भी खुशी से गुजार दे…। उनके प्रपौत्र संधू का कहना है कि इन लाइनों को लिखने वाला भला नास्तिक कैसे हो सकता है।

अब याद करुंगा भगवान को वह मुझे बुझदिल समझेंगे –उनका कहना है कि शहीद-ए-आजम अंधविश्वास और भगवान के नाम पर अकर्मण्य बन जाने के विरोधी थे। व्हाई आई एम एथिस्ट को लोगों ने गलत अर्थों में लिया। उन्होंने बताया कि जब 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी लगाने के लिए ले जाया जा रहा था तो लाहौर सेंट्रल जेल के केयर टेकर छतर सिंह ने उनसे अंतिम समय भगवान को याद करने को कहा। इस पर भगत सिंह ने जवाब दिया कि सारी जिंदगी दुखियों और गरीबों के कष्ट को देखकर मैं भगवान को कोसता रहा, अब यदि उन्हें याद करुंगा तो वह मुझे बुझदिल समझेंगे और कहेंगे कि मौत से डर गया। इस कथन से भी पता चलता है कि वह नास्तिक नहीं थे।

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Dayanand Kumar Deepak

Dayanand Kumar Deepak is the MD (Managing Director) and CEO (Chief Executive Officer) of biharisir.com and Whole Time Director, Independent Director, Shareholder/Investor Grievance Committee, Remuneration Committee.

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